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कोई नहीं समझ रहा पूर्वांचल का दुख

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पूर्वी उत्‍तर प्रदेश के साथ सरकार ने नाइंसाफी की है। बजट में इस बार भी पूर्वांचल छला गया है। बार बार छला जाना यहां की नियति हो गयी है। यह कोई नया खेल नहीं है। अंग्रेजों के जमाने से पूर्वांचल उपेक्षित है। यहां के लोगों के प्रतिरोध की ताकत अंग्रेजों को डराती है। आजादी बाद इसी ताकत से काले अंग्रेज भी डर रहे हैं। यही वजह है कि पूर्वांचल की गाडी विकास की पटरी पर दौड नहीं पायी। यह तो एक अदद लल्‍लू स्‍टेशन की तरह एक बार छूटा तो बार बार छूटने की रवायत बन गया है।

कबीर, गौतम बुद़ध और गुरु गोरक्ष के इस पूर्वांचल में अब दुख ही दुख है। इसके माथे पर कहीं संजरपुर है तो कहीं गरीबी, बेकारी और भुखमरी का कलंक। कभी आपने सोचा क्‍यों छला जा रहा है, यह इलाका, क्‍यों उपेक्षित कर दिया गया है पूर्वांचल। बात शायद आप सबकी समझ में आये लेकिन इसकी जड आजादी की लडाई से जुडी है। तब जब पहली बार स्‍वाधीनता संग्राम की नींव पडी तो बलिया के मंगल पाण्‍डेय उसकी पहली ईंट बन गये। वीर कुंवर सिंह का बलिया से लेकर आजमगढ तक का संघर्ष भी अंग्रेजों के वंशजों को भी नहीं भूला होगा। बाद में जब क्रांति शुरू हुई तब भी पूर्वांचल सबसे आगे था। 6 फरवरी 1922 को गांधी जी के असहयोग आंदोलन के दौरान  चौरीचौरा थाना फूंका गया तब पूरी दुनिया यहां की क्रांति से वाकिफ हुई। बलिया के चित्‍तू पाण्‍डेय ने अपने दम पर अंग्रेजों के साम्राज्‍य में सूरज न डूबने के रिकार्ड को ध्‍वस्‍त कर बलिया को आजाद करा दिया था। उसके पहले गोरखपुर के बंधु सिंह की कुर्बानी इतिहास का दस्‍तावेज बन गयी थी। आजादी की लडाई में उदाहरण तो इतने हैं कि कई किताबें बन जायेंगी। पिपरीडीह ट्रेन डकैती ने आजादी की लडाई के लिए खजाने का बंदोबस्‍त किया। यह सब कुछ उन पूर्वजों की गौरवगाथा है जो गुलामी की बेडियों को काटकर आजाद होने का ख्‍वाब देखते थे। अब उनकी अतप्‍त आत्‍मा है। उन शहीदों की यादें हैं लेकिन इन सबके बावजूद कुर्बानी की कोई कीमत नहीं है। 1901 में अंग्रेजों ने इस इलाके को लेबर एरिया घोषित कर यहां के लोगों से एग्रीमेंट किया। गिरमिटिया मजूदरों के रूप में यहां के लोग पिफजी, सूरीनाम, गुयाना, मारीशस, त्रिनिदाद और टोबैको जैसे देशों में गये। वे लोग अब वहां शासन कर रहे हैं लेकिन उनके भाई बंधु आज भी गिरमिटया मजूदरी के कलंक से उबर नहीं पाये हैं। आज भी मजूरी के सीजन में कुछ लोग गांव लौट आते और ि‍फर वे दिल्‍ली, मुम्‍बई, कलकत्‍ता, हरियाणा की ओर रुख कर देते हैं। तब घरों से रेलिया बैरी पिया को लिये जाय रे::::: जैसे विरह गीत गूंजने लगते हैं। तब वेदना अंखुवाती है और हर घर की दुल्‍हनों के ख्‍वाबों की सरहद दिल्‍ली, मुम्‍बई और कलकत्‍ता हो जाती है। दुख तो तब बढ जाता है जब परदेस गये उनके पिया एड़स लेकर लौटते हैं और जवानी तिल तिल कर मरने लगती है।

यह सब क्‍यों हुआ। आजादी के बाद भी यहां की तस्‍वीर क्‍यों नहीं बदली। 1952 में बने के:एम: पणिक्‍कर आयोग की रपटों को क्‍यों दरकिनार कर दिया गया। गाजीपुर के सांसद विश्‍वनाथ गहमरी की दर्द भरी अपीलों पर पटेल आयोग बनाकर उसकी सिफारिशों को क्‍यों उपेक्षित कर दिया गया। सेन कमेटी की रिपोर्ट कहां गुम हो गयी। सवाल दर सवाल हैं। आज बस पूर्वांचल के दुखों को लेकर अलग पूर्वांचल राज्‍य का मुद़दा गरमाया जा रहा है। पर यह मुद़दा कौन गरमा रहा है। हाशिये पर गये हुये लोगों के लिए ही पूर्वांचल राज्‍य है। जो भी मुख्‍य धारा में रहा उसने कभी पूर्वांचल राज्‍य के मुद़दे पर अपनी जुबान नहीं खोली। अब अमर सिंह पूर्वांचल राज्‍य को लेकर उम्‍मीदें जगा रहे हैं। पूर्व केन्‍द्रीय मंत्री कल्‍पनाथ राय, रामधारी शास्‍त्री, सुरेश यादव, पूर्व राज्‍यपाल मधुकर दिघे, शतरूद्र प्रकाश, अंजना प्रकाश जैसे न जाने कितने लोग इस मुद़दे के इतिहास बने गये हैं। अभी भविष्‍य बनने के लिए कुछ स्‍वयंभू संगठन भी लगे हुये हैं। पर पूर्वांचल की जनता इस छद़म युदध में शामिल नहीं हो रही है। उत्‍तराखण्‍ड और झारखण्‍ड की तरह राज्‍य बंटवारे को लेकर सडकों पर कभी कोई गूंज सुनायी नहीं दे रही है।

चुनावों के दौरान इतिहास के पन्‍ने पलटने पर हमें तो हमेशा यही लगा कि यहां के लोगों के प्रतिरोध की ताकत ही उनके विकास की सबसे बडी दुश्‍मन बनी। उन दिनों जब पण्डित जवाहर लाल नेहरू की अपील जनमानस पर अपना असर छोडती थी उन दिनों भी पूर्वांचल में विरोध की आवाज का मतलब था। पडरौना में नेहरू की अपील के खिलाफ जनता ने सोशलिस्‍ट पार्टी के रामजी वर्मा को 1952 में अपना सांसद बना दिया तो यह इलाका उनकी नजरों में चुभने लगा। हमेशा प्रतिपक्ष को मुखर करने में यहां के लोगों ने अपनी ताकत दी। सत्‍ता में पैर जमाने के लिए भी खूब मदद की लेकिन यहां का तेवर सत्‍ता को रास नहीं आया। चाहे सपा हो या बसपा, जब उनके पैर जमे तो जमीन पूर्वांचल की ही थी। पूर्वांचल ने सबको सिर माथे पे बिठाया लेकिन किसी ने यहां की तकदीर और तस्‍वीर नहीं बदली। पूर्वांचल ने जब जी चाहा लोगों को ताकत दी और मन से कोई उतरा तो उसे सिंहासन से नीचे उतार दिया। इस डर ने यहां भेदभाव के बीज बोने शुरू कर दिये। सियासतदारों ने पूर्वांचल को अपने अपने लिए एक प्रयोगशाला बना दिया। लिहाजा बहुत ही ताकतवर पूर्वांचल अपने प्रतिरोध को सही दिशा नहीं दे पाया। सियासतदारों ने तो इसे जाति, धर्म और अपराध के खांचों में बांट दिया। टुकडों-टुकडों में बंटे लोग राजनीति के औंजार बनते रहे और उनकी अपनी पहचान नहीं बन पायी। अब यहां सिर्फ दुख ही दुख है। यहां की प्रतिभाओं को भी उचित प्‍लेटफार्म नहीं मिल रहा है।

उद़योग के क्षेत्र में तो यहां की हालत वैसे ही पतली है। बिजली नहीं है। सडकें टूटी हैं। नदियां सिर्फ उफनाती हैं। नहरे सूख गयी हैं। पानी का स्‍तर घटने लगा है। दर्द एक हो तब तो बताएं यहां तो घाव ही घाव है किसे किसे दिखायें। पूर्वांचल में 1903 में देवरिया जिले के प्रतापपुर में गांधी जी की पहल पर एक औद़योगिक घराने ने चीनी मिल की स्‍थापना की। बाद के दिनों में यहां चीनी मिलों की संख्‍या बढकर 26 हो गयी। पर गन्‍ना किसानों की उपेक्षा, गन्‍ना मूल्‍य का बकाया और सरकारी उत्‍पीडन से चीनी मिलों ने दम तोडना शुरू कर दिया। अब तो सिर्फ 13 चीनी मिलें ही यहां रह गयी हैं जो चालू हालत में हैं मगर  वह भी बीमार हैं। गोरखपुर का फर्टिलाइजर कारखाना 1991से बंद है। हम हमेशा सुनते आ रहे हैं कि कारखाना चालू होगा। पर उसकी उम्‍मीद नजर नहीं आती। नरसिम्‍हा राव प्रधानमंत्री होकर गोरखपुर आये थे। उन्‍होंने एलान किया- फर्टिलाइजर कारखाना चालू होगा , जनता की उम्‍मीदों को पंख लग गये। लगा कि अब गोरखपुर गुलजार हो जायेगा, लेकिन सपना सपना ही रह गया। इस सपने को देवगौडा ने भी जगाया। गुजराल, अटल विहारी वाजपेयी और पिछले चुनाव में मनमोहन सिंह ने भी इसे हवा दी। रामविलास पासवान तो ऐसे बोलते थे जैसे उनका विमान उडा और कारखाने के लिए कार्य शुरू हो गया। कुछ नहीं हुआ। नेपाल की जलकुण्‍डी और करनाली परियोजना भी अभी तक वैसे ही है। हर साल आने वाली बाढ में पूर्वांचल और बिहार बर्बाद होता है। सैकडो एकड भूमि उसर हो जाती है। हजारों परिवार बेघर हो जाते हैं लेकिन सत्‍ता प्रतिष्‍ठानों को इसकी पिफक्र नहीं है। लोग तो मस्‍त हैं और नेपाल की सरहद भारत के लिए असुरक्षित होती जा रही है। जाली नोटों के कारोबार ने जडे खोखली कर दी हैं, अर्थव्‍यवस्‍था चरमरा रही है। लगे हाथ यहां के बेरोजगार बिगड रहे हैं। मोबाइल, बाइक और असलहों की चाह ने युवाओं की दिशा बदल दी। जाली नोटों के कारोबार में वे तस्‍करों के हाथों का खिलौना बन गये हैं। इश्कियां जैसे सिनेमा में विशाल भारद्वाज यहां की स्थिति दिखाते हैं तो लोगों को तकलीफ होती है। सिनेमा के पोस्‍टर फाडे जाते हैं लेकिन कभी उस दर्द को कोई शिद़दत से नहीं  समझ सका है।

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75 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Dollie के द्वारा
May 21, 2011

AFAICT you’ve coveerd all the bases with this answer!

Connie के द्वारा
May 21, 2011

Snouds great to me BWTHDIK

shaileshasthana के द्वारा
October 5, 2010

राय साहब आपने मुद्दा तो अच्छा उठाया मगर शुरू से अंत  तक सिर्फ पीड़ा ही बयान किया कोई उपाय नहीं सुझाया।  आपने ये तो लिखा कि यहां उत्तराखंड और झारखंड  की तरह सड़कों पर कोई आवाज नहीं सुनाई पड़ती  मगर यह क्लीयर नहीं किया कि ऐसा करने के लिए क्या  करना होगा। शायद इसकी जिम्मेदारी कलम नवीसों को ही  उठानी पड़ेगी। क्योंकि लोगों को पहले विचारों की तेज धार  से तैयार करना होगा और राजनेताओं को इसके लिए तैयार  करना होगा कि वे इसे हर हाल में उठाएं।   बेहतर पोस्ट केलिए बधाई। 

upendrapandey gkp के द्वारा
February 16, 2010

पूर्वांचल को छला जाना उसकी नियति बन चुकी है। देश की आजादी में इस क्षेत्र ने अहम योगदान दिया। पंडित जवाहर लाल नेहरू,चन्द्रशेखर व वी.पी सिंह जैसे नेता इस अंचल से उठकर प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे लेकिन इस क्षेत्र के साथ न्याय नहीं हुआ। यहां के गरीबी की बात संसद में भी उठी। फिर भी ढाक के वही तीन पात। यूपी से निकलकर उत्तराखंड अलग राज्य बन गया। झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य भी बना दिए गए। आनन्द जी आपने सही कहा है कि पूर्वांचल राज्य का मुद्दा हाशिए पर गए ही लोग गरमाते हैं। सिर्फ अखबारों में ही पूर्वांचल राज्य का मुद्दा गरम होता है,आम जनता कभी इसमें शामिल नहीं हुई। उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान मैं मुरादाबाद में था और देहरादून भी जाना होता था,किस तरह पहाड़ के लोग आंदोलन के प्रति जुटे हुए थे,यह देखने लायक था। वहां के लोगों के जुझारूपन के कारण ही उत्तराखंड का सपना साकार हुआ। अब तो बिहार जैसा राज्य भी विकास के पायदान पर हमसे आगे है। नारायण दत्त तिवारी ने यूपी में मुख्यमंत्री रहते हुए गजरौला व काशीपुर को उद्योगों से समृद्ध कर दिया। यहां तो गोरखपुर का खाद कारखाना सालों से बंद है। कई बार अखबारों में मंत्री गण के बयान इसे चालू करने के बारे में आए लेकिन फिलहाल तो इसे चालू किया जाना दूर की कौड़ी ही दिखायी दे रहा है। चीनी मिलों की हालत से भी हम सब वाकिफ हैं। दरअसल वीरबहादुर और कल्पनाथ राय जैसे नेताओं की भी आज कमी खलती है क्योंकि दिल्ली और लखनऊ में यहां की आवाज बुलंद करने वाला रहनुमा नहीं दिखता।

    अम्‍बुज के द्वारा
    April 12, 2010

    कमेंट पढ कर लगा कि आप भी दिमाग रखते हें। लगे रहिए लिखना भी आ जायेगा।

sunil के द्वारा
February 14, 2010

baat keval purvanchal ki nahi hai.hamara sara uttar pradesh hi pichde pan ka shikar hai ,gramin samaj se judkar rural devolepment men job karte huye meine is pradesh ki garibi ke karno ko bahut najdeek se samjha aur dekha hai.yaha par ek garib ko apne bacche ka ilaaj bade hospital men karaane ke lye apni jameen girvi rakhkar paise ki vyavastha karni padti jio ki akhir men uske haath se nikal jaati hai kyiki voh muldhan aur vyaj ki dhan rashi samay se ada nahin kar paata .jis desh aur pradesh ka garib aadmi khushak nahi ho payega uski surat badalna asamabhav hai.suniol rathore vdo etah

mahendrakumartripathi के द्वारा
February 11, 2010

बहुत सटीक सोच ,सामयिक समय राजनेता भीं जाने आपको बधाई आदर सहित महेंद्र कुमार त्रिपाठी देवरिया

प्रशान्त पाण्डेय के द्वारा
February 11, 2010

फणीश्वर नाथ रेणु ने अपने आंचलिक उपन्यास “मैला आंचल” मे लिखा है..”दुनिया फूस बटोर चुकी है, मैं दो चिन्गारी दे दूंगा”..कुछ यही हाल पूर्वांचल के विकास के साथ जुड़ा हुआ है..दरअसल पूर्वांचल के विकास की बातें जितनी ज़बानी जमाखर्च के ज़रिये होती आयी हैं उतनी हक़ीक़त के सच्चे दो शब्दों मे कभी नहीं..

    Sharad के द्वारा
    February 12, 2010

    प्रशांत जी, ये पूर्वांचल का ही नहीं पुरे देश का दुर्भाग्य है. गन्दी राजनीती और भ्रस्टाचार की जड़े बहुत गहरी हो चुकी है.

anand mishra के द्वारा
February 11, 2010

भइया सादर प्रमाण, अापकी लेखनी में सदैव धार रही है। इधर काफी िदनों से अापको पढ़कर कुछ सीखने को नहीं िमल रहा था। इंटरनेट के माध्यम से यह कमी दूर हुइ है, वैसे अापकी खबरें अब इलाहाबाद संस्करण में भी छपने लगी हैं। मुझे गवर् है िक मैं अापका िशष्य हूं। पूर्वांचल की पीड़ा को अापने लोगों तक पहुंचाया है। इर्शवर से प्राथर्ना है िक अापकी यह कोिशश रंग लाए। अानंद

Anand Rai, Jagran के द्वारा
February 10, 2010

सबसे पहले मैं शुक्रगुजार हूं उन पाठकों का जिन लोगों ने मेरी हौसला आफजाई की। सबके प्रति दिल से आभार। शरद जी आप पूर्वांचल के विकास के लिए सहयोग करना चाहते हैं। आपका स्‍वागत। आप अपनी मेल आई डी पोस्‍ट कर दें तो हमें आपसे पूर्वांचल के संदर्भ में बातचीत करने में सुविधा रहेगी। दैनिक जागरण ने पूर्वांचल की समस्‍याओं पर नियमित स्‍टोरी प्रकाशित की है और जनप्रतिनिधियों से संवाद स्‍थापित कर उसके निदान की दिशा में भी पहल की है। आपके पास पूर्वांचल के विकास के संदर्भ में कैसी योजना है, उसकी जानकारी होने से खबर के स्‍तर पर और इवेंट के स्‍तर पर हमें सहूलियत होगी। आपकी नेक सोच के लिए आपको मुबारकवाद।

    Sharad के द्वारा
    February 12, 2010

    sharadkpandey@googlemail.com . आनंद जी, आप कभी भी मुझे उपयुक्त ईमेल पते पर ईमेल कर सकते है. शरद पाण्डेय

    अम्‍बुज के द्वारा
    April 12, 2010

    शुक्रगुजार नहीं होगें तो रेट कैसे बढेगा। दुर्भागय है शाला ब्‍लाग पर भी लेनी देनी और तेल मालिश शुरू हो गया। आप जेसे लोग हमेशा आगे निहुरे रहें शुभकामना।

Dr.Chaturvedi के द्वारा
February 9, 2010

Only unity and networking is the way for strength and success for development of poorvanchal

    Sharad के द्वारा
    February 12, 2010

    I am agree with Dr Chaturvedi, group efforts and initiatives are very important and would definitely support in development of purvanchal. Regards, Sharad Pandey

Dr.Chaturvedi के द्वारा
February 9, 2010

Poorvanchal par kisi ne bhi dhyan nahi diya hai

Sharad Pandey के द्वारा
February 9, 2010

आनंद जी अगर आप और जागरण कुछ सहयोग करे तो पूर्वांचल के विकास के लिए कुछ किया जाये. जिससे पूर्वांचल की उन्नति हो. हम सभी जानते है की राजनीती का सच क्या है. पुराने पन्नो को पुलटने से कुछ नहीं होगा. आगे बढ़ने के लिए सही निति बनाकर काम करना पड़ेगा. जागो युवा वर्ग – ऊपर वाला उन्ही का साथ देता है जो अपनी मदद खुद करता है . कुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रह कर कुछ नाम करो ये जनम हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमे ये व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो न निराश करो मन को उपयुक्त पाक्तिया मैथली शरण गुप्त द्वारा रचित कविता से ली गयी है मगर इनको पढने मात्र से उत्साह बढ़ जाता है. शरद पाण्डेय ऑक्सफोर्ड, ब्रिटेन

rajesh ranjan के द्वारा
February 8, 2010

apne desh men aise anchal hain jahan jane ke bad sirf bebsi dikhti hai, purwanchal men to har jile men bebas gaanwo ki kataar hai. bhukh aur bimari se marne valon ki koi ginti nahi hai.

    Gatsy के द्वारा
    May 20, 2011

    I’m out of laegue here. Too much brain power on display!

Krishna Raghava के द्वारा
February 8, 2010

purvanchal ke baarey mein itnee vistrit, sateek aur ashrupurna jaankaari meine nahi parhi. kaash mein kuchh thoss kar paata sivaay iske ki apkey samarthan mein apni awaz bhi mila doon. kitney upekshit anchal hain apney desh mein aur koi sunwaee nahi azadee ke 77 saal baad bhi! asahaayataa ki bhi koi seema hai kya?

Manoj Rai के द्वारा
February 8, 2010

purwanchal bhale sadiyon se upechhit hota raha hai lekin ab sabke liye jaroorat ho gaya hai, sabhi rajnitik dalo ne purwanchal ke logon ko kitna mahtv dena shuru kiya hai yah dikh raha hai. mahtv pane vale netaon ke jimevari hai ki ve purwanchal ka bhla kare.

विनय के द्वारा
February 8, 2010

समाजवादी पार्टी ने पूर्वांचल के मसले पर आज विधानसभा में हंगामा खड़ा कर दिया. इस हंगामें के पीछे भी सिर्फ सियासत है. जब सपा की सरकार थी तब भी पूर्वांचल विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ. पूर्वांचल की तस्वीर तो सरकारी आंकड़ों में भी खराब है. सिक्षा, स्वास्थ्य और सभी बुनियादी सुविधाओं में पूर्वांचल सबसे पीछे है. विनय

yashwant singh के द्वारा
February 8, 2010

बढ़िया लिखा भाई. आभार

chetan pant- nepal के द्वारा
February 8, 2010

Sun rise from the east.These all great Ram ; Buddha; Gortakh nath & all from the east. Frist human civilization also started from the east. Anand Bhai east never lost always rise. One day east have a good day just wait for the time Pusvanchal rise. your loving bro chetan chetanpnt@yahoo.com

    Magdelina के द्वारा
    May 20, 2011

    TYVM you’ve solved all my prlboems

Rahul Tripathi के द्वारा
February 8, 2010

चोरो की नगरी में डकैत जब घुस जाये तो सोचिए क्या होगा यही हाल अब उत्तर प्रदेश का हो गया है यहाँ पर दलालो और डकैतों ने दोस्ती कर ली है आवाम तो बंदर बनकर सिर्फ देख सकता है इससे ज्यादा कुछ नहीं………. rahul_ntv@yahoo.comमोबाइल नंबर:+91-9621689616अन्य:05522235658

Sarbjeet Pathak के द्वारा
February 8, 2010

आदरणीय आनंद जी आप का ये लेख जो पूर्वांचल के दर्द के बारे मैं है अच्छा है , समस्या तो अपने गिना दी है , पर क्या कोई समाधान का भीं उपाय है, मैं पत्रकार तो नहीं हूँ पर दिन भर पत्रकारों के बिच मैं ही रहता हूँ , मंत्री और संत्री की बात जाने दीजिये , ये पहले अपने लिए करेंगे और बाद मैं जनता जनार्दन के लिए , और अपने से ही कभी मन नहीं भरता तो दुसरे के लिए करने का सवाल ही नहीं पैदा होता है. वैसे अपने काफी गंभीर समस्या को उठाया है , अगर ये कारखान और बाकि चीजो पर सरकर ध्यान दे तो यहाँ के लोगो को यहाँ से बहार नहीं जाना पड़ेगा ,

    Mimosa के द्वारा
    May 21, 2011

    Got it! Thanks a lot again for hlpenig me out!

Sarbjeet Pathak के द्वारा
February 8, 2010

आदरणीय आनंद जी आप का ये लेख जो पूर्वांचल के दर्द के बारे मैं है अच्छा है , समस्या तो अपने गिना दी है , पर क्या कोई समाधान का भीं उपाय है, मैं पत्रकार तो नहीं हूँ पर दिन भर पत्रकारों के बिच मैं ही रहता हूँ , मंत्री और संत्री की बात जाने दीजिये , ये पहले अपने लिए करेंगे और बाद मैं जनता जनार्दन के लिए , और अपने से ही कभी मन नहीं भरता तो दुसरे के लिए करने का सवाल ही नहीं पैदा होता है. वैसे अपने काफी गंभीर समस्या को उठाया है , अगर ये कारखान और बाकि चीजो पर सरकर ध्यान दे तो यहाँ के लोगो को यहाँ से बहार नहीं जाना पड़ेगा ,

    Isabella के द्वारा
    May 21, 2011

    Thank God! Someone with brains seapks!

ANAND के द्वारा
February 8, 2010

पूर्वांचल के मुद़दे पर सपा ने विधानसभा में हंगामा खडा किया है। पूर्वांचल की उपेक्षा को सपा ने मुद़दा बनाया है लेकिन राज्‍य बंटवारे के मसले पर उसने उत्‍तराखण्‍ड की बदहाली का उदाहरण प्रस्‍तुत किया है। जैसे भी हो यह मुद़दा गरमा रहा है।

Rahul Kumar Shahi, Bangkok के द्वारा
February 8, 2010

Bhiya, Really your topic will force not only me but every one , who belongs from PURVANCHALl, and it encourage us to think about it. but i think , we should depend on us and work hard for it . no need to believe on our politicians. And hope one day we will get success.. Thanks

Rajkumar Singh के द्वारा
February 8, 2010

पूर्वांचल का दुख़ पूर्वांचल के लोगो की देन है उसको कोई राजनेता नहीं बदल सकता वहा की जनता को बदलना है और वहा की जनता है की चुनाव में एक पैकेट सराब लेके वोट करती है तो उसका काया कल्प कैसे होगा पूर्वांचल का विकास तभी होगा जब जनता प्रत्यासी से सराब के बारे में न पूछकर शेत्र के विकास के बारे में पूछेगी

Rajesh Singh के द्वारा
February 8, 2010

आज भी मजूरी के सीजन में कुछ लोग गांव लौट आते और फिर वे दिल्‍ली, मुम्‍बई, कलकत्‍ता, हरियाणा की ओर रुख कर देते हैं। तब घरों से :::::इ रेलिया बैरी पिया को लिये जाय रे::::: जैसे विरह गीत गूंजने लगते हैं। तब वेदना अंखुवाती है और हर घर की दुल्‍हनों के ख्‍वाबों की सरहद दिल्‍ली, मुम्‍बई और कलकत्‍ता हो जाती है। दुख तो तब बढ जाता है जब परदेस गये उनके पिया एड़स लेकर लौटते हैं और जवानी तिल तिल कर मरने लगती है। आनंद जी वाकई आपके लेख नें दिल और दिमाग दोनों को झकझोर के रख दिया उपेक्षा का दंस झेलता पूर्वांचल राजनेताओं और उनकी पार्टियों का चरागाह बन गया है इसे जानबूझ कर गिरमिटया मजदूरों के मनीऑडर की अर्थव्यवस्था के सहारे छोड़ दिया गया है ।

santosh rai के द्वारा
February 8, 2010

ham to bhai yahi kahenge ki har admi apne men sudhar kar le to sab theek ho jayega. ham sudhrenge, jag sudhrega… khalee bhashan dene se kuchh nahi ho sakta.

एस के शाही के द्वारा
February 8, 2010

पूर्वांचल के दुःख को समझने के लिए सियासत की दीवार गिरानी होगी. जब तक वोट की राजनीति होगी तब तक पूर्वांचल का भला नहीं हो सकता. अंग्रेजों ने अपना साम्राज्य बचाए रखने के लिए यहाँ भेदभाव किया और राजनेता अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए इस अंचल को गरीब और कमजोर बनाए रखना चाहते हैं. धन्यवाद सर, आपने बहुत ही बारीकी से चित्रण किया है. एस के शाही

Tapashwani Anand के द्वारा
February 8, 2010

VIKAS to hoga par kiska ye sabhi jante hai. isliye anurodh yahi hai ki miljul kar hi rahne de “dange aur fasad” se keval nuksan hi hota hai..jitna mil raha hai khus hai aur milega aur smarke banenge pet khali ho ghoomane maza bhi nahi aata hai. aur purvanchal ki ek kahavat hai chhuchundar mar ke haanth ganda kyon kare….tapashwani@gmail.comमोबाइल नंबर:09891357021

    Mccayde के द्वारा
    May 20, 2011

    At last! Somonee who understands! Thanks for posting!

Tapashwani Anand के द्वारा
February 8, 2010

VIKAS to hoga par kiska ye sabhi jante hai. isliye anurodh yahi hai ki miljul kar hi rahne de “dange aur fasad” se keval nuksan hi hota hai..jitna mil raha hai khus hai aur milega aur smarke banenge pet khali ho ghoomane maza bhi nahi aata hai. aur purvanchal ki ek kahavat hai chhuchundar mar ke haanth ganda kyon kare….

Manoj के द्वारा
February 8, 2010

bahut hi marmik dhang se aapne purvanchal ki dukh ko utaya hai. sharad ji ne is par satik prtikriya ki hai.

spande10 के द्वारा
February 7, 2010

आदरणीय आनंद जी और सभी जागरण बंधुओ को शरद पाण्डेय का नमस्कार. आपके ब्लॉग को पढ़कर पूर्वांचल की पूर्व गतिविधियों के बारे में पता चलता है. हमे विकास की दर को गति देने के लिए पूर्वांचल के युवा वर्ग की सोच को बदलना पड़ेगा. जब कभी में पूर्वांचल की तुलना दुसरे राज्यों से करता हु तो कई तथ्य सामने आते है जिसे से की हमारा पूर्वांचल अभी भी देश के बाकी हिस्सों से पिछड़ा हुआ है. हमे apni सोच और युवा वर्ग की sochne की chamta को badalna hoga. और एक nayi disha की और प्रस्थान करना hoga. कारन कुछ इस प्रकार से है – १. पुँर्वांचल के सभी जिलो में युवा वर्ग का जागरूक न होना और शिक्षा का आभाव. २. युवा वर्ग में दूर दर्शिता और भविष्य प्रबंधन में कमी, एक दुसरे पैर निर्भरता को होना. ३. चूँकि पूर्वांचल का अधिकतर हिस्सा गाँव में निवास करता है और खेती पैर निर्भर है इसलिए खेती की आधुनिक तकनीकियो की जानकारी ना होना. इससे किसानो का खेती पर से विश्वास उठ रहा है और वो दुसरे शेहरो की तरफ रोज़गार की तलाश में प्रस्थान कर रहे है. ४. हमारे युवा वर्ग के लिए अभी भी संसाधनों की कमी है उनके लिए किसी भी प्रकार की सरकारी या गैर सरकारी संस्था नहीं है जो उन्हें भविष्य के बारे में सही जानकारी दे और मार्ग दर्शन करे. ५. सरकार द्वारा दिए गए धन का सही उपयोग न होना. सरकार द्वारा शुरू की गयी विभिन नीतियों का सही तरीके से लागू न होना. ६. रोजगार की कमी से युवा वर्ग का रुझान धनउपार्जन के गलत तरीको की तरफ अक्सर आकर्षित हो जाता है जो बड़ा ही दुखद पूर्ण है. ७. पूर्वांचल में आधुनिक उध्योगिकीकरण की कमी है और ये कहना गलत नहीं होगा की ना के बराबर है. ये mera pehla ब्लॉग है इसलिए galtiyo के लिए chama chahta हु. scripting में कुछ error की vajah से mujhe ये comment yahi khatam करना pad रहा है. शरद पाण्डेय Oxford, UK

v. rai. azm के द्वारा
February 7, 2010

girish sir mujhe jahaan tak yad hai aap bhikhari ke baich ke hain, bhikhari sir shayad apne gav ke pradhan ho gaye hain, apne anad rai ki post par sabse acchi tipdi ki, pure pradesh ke hit ki bat apne sochi, ekta ki yahi asli soch hai.

sumit rana के द्वारा
February 7, 2010

rajesh ji apne thik kaha lekin yahaan ke janta ko aap log hi samjha sakte hain. ek vaicharik andolan ki jarurat hau jo janta ka dil dimag badal de.

rajesh chandra mishra के द्वारा
February 7, 2010

sir very very good report on purvanchal. In 1962 there was a SDM in Sonbhadra,his name Dharmendra Rai.he wrot a book abuot this area focus to sonachal.his line is ‘yaha ke logo ka khun(blood) jitan thanda(cold) hai utana kahi ke loga ka nahi hai. I mean people know what is good what is bad.so why the chosoe bad way.bad way mean wrong MP.MLA. you r thinking about this area.u feel the problam of others.who many people think about the social matter. Sir u told me one day about the diffrenc of purvanchal and paschimanchal(west).i think that is the main issue. By the way sir mindblowing story.realy its too good. Rajesh Chandra Mishra Reporter, Hindustan.

sumit rana के द्वारा
February 7, 2010

purvanchal rajy ke liye yogi ji bol rahe hain. amar singh bol rahe hain aur sanjayn jaise kai neta bhi bol rahe hain. ye sab log ek manch par aa jayenge to aur kuchh ho ya n ho rajy jaroor ban jayega.

k.k.shukla के द्वारा
February 7, 2010

फर्टिलाइजर कारखाना चालू होगा , जनता की उम्‍मीदों को पंख लग गये। लगा कि अब गोरखपुर गुलजार हो जायेगा, लेकिन सपना सपना ही रह गया. वाह बहूत शिद़दत से समझे.

akhilesh singh के द्वारा
February 7, 2010

badh men, hadtaal men, jati ke janjal men, majhab ke baval men purvanchal pata nahi kab se barbad ho rah hai. barbaad karne vaale log m.p. aur m.l.a. ban rahe hain to fir bhala kaise iska vikas hoga. apke dil men dard utha iske liye shukriya ray saheb.

navneet tripathi gorakhpur के द्वारा
February 7, 2010

नेताओं दवारा बार-बार छला जाने वाला पूर्वी उत्‍तर प्रदेश अपनी इस दुदर्शा के लिये खुद भी कम जिम्‍मेदार नहीं है। अपने हक के लिये यहां के लोग जब तक खुद खडे नहीं होंगे तब तक उन्‍हें कुछ हासिल होने वाला नहीं है।

girish pandey gkp के द्वारा
February 7, 2010

बात सिर्फ पूर्वांचल की नहीं समूचे सूबे की होनी चाहिये। यह ठीक है कि पूर्वांचल पश्चिमी उप्र की तुलना में पिछडा हैापर पद्रेश की हालत भी तो खस्‍ता हैा तेंडुलकर स‍िमिति की रिपोर्ट के अनुसार यहां के हर 5 लोगों में से 2 लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैंा शहरों की तुलना में गांवों की स्थिति और भयावह हैा पर किसी भी राजनीतिक दल के लिये ये मुद़दा नही हैा केंद्र से आया पैसा कहां गया कैसे खर्च हो रहा है इसकी मानीटरिंग करने की फर्सत किसी को नहीं हैा दरअसल यहां तीन तरह के नेता असली,नकली और फसलीा अंतिम दो तो महज चुनाव के समय प्रकट होते हैं और चुनाव के साथ ही विदा हो जाते हैंा पहले तरह के लोग भी वहीं मुद़दा उठाते हैं जिससे उनकी राजनीतिक फसल लहलहाती रहेा कितनी बडी त्रासदी है कि जिन योजनाओं मसलन फूड पार्क,टेक्‍सटाइल पार्क,रामगढ ताल,खाद कारखाना जैसे मुद़दों पर जो लोग सरकार पर दबाव डालने में सक्षम हैं वे लोग कभी बोलते ही नहींा ऐसे लोगों की खामोशी में न केवल पूर्वी उप्र बल्कि पूरे सूबे की बदहाल छिपी हैा पिुलहाल इस सूबे का भगवान ही मालिक हैा गिरीश पांडेय दैनिक जागरण गोरखपुर

Ashok Choudhary, Jagran के द्वारा
February 7, 2010

पूर्वांचल पर कोई क्‍यों ध्‍यान देगा भाई, यह जवार जो बागी ठहरा। अंग्रेजी हुक्‍मरानों की आंख में शूल की तरह गड़ता रहा। आजादी के बाद भी इसे इसलिये भाव नहीं मिला क्‍योंकि इसने खुद किसी को भाव नहीं दिया। दरअसल बहस इस पर होनी चाहिए कि छोटे राज्‍य बनने पर ही विकास होगा या पिफर विकास की राह में रोड़ा कुछ और है।

कौशल शाही के द्वारा
February 7, 2010

पूर्वांचल राज्‍य बनेगा और यहां के लोग सडक पर उतरेंगे। अभी तक कोई नेता ठीक से अगुवाई नहीं किया था लेकिन अमर सिंह ने आवाज बुलंद की है।

GANGESH के द्वारा
February 7, 2010

aam janta ke sadak par utre bina kuchh nahi ho sakta, ek baat aapne galat likhi ab purvanchal men pratirodh ki takat nahi rahi, sarakr ne bajat men upeksha kee magar koi virodh nahi huaa…


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