blogid : 157 postid : 41

कलम अ।ज उनकी जय बोल

Posted On: 14 Feb, 2010 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

pt. vidya niwas mishra

pt. vidya niwas mishra

आनन्द राय, गोरखपुर

पद्म भूषण पं. विद्या निवास मिश्र के गुजरे पांच साल बीत गये। मौके-बे-मौके उनकी बहुत याद आयी। अपनी कोमल भावनाओं के कारण सराहे गये पण्डित जी गोरखपुर के गांव-जवार से उठकर हिन्दी साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्र बन गये। इस दुनिया से वे भले ओझल हैं लेकिन उनकी कृति सबको आलोकित कर रही है। वे साहित्य और पत्रकारिता  के बीच एक सेतु की तरह थे। रविवार को उनकी  पांचवीं पुण्यतिथि है और कलम उनकी जय बोल रही है।
 28 जनवरी 1925 को गोरखपुर जनपद के पकड़डीहा गांव में जन्मे पं. विद्यानिवास मिश्र ने मध्यप्रदेश के सूचना विभाग से लेकर वाशिंगटन विश्र्वविद्यालय और अमरीका के वर्कले विश्र्वविद्यालय में शब्दों की खेती की। पाणिनी के व्याकरण पर गोरखपुर विश्वविद्यालय से डाक्टरेट पं. जी को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में 1996 में पद्म भूषण मिला। बाद में उन्हें राज्यसभा का सदस्य भी मनोनीत किया गया। सम्पूर्णानन्द विश्र्वविद्यालय के कुलपति और नवभारत टाइम्स के संपादक होने के साथ ही उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित किया। 14 फरवरी 2005 को दोहरीघाट के पास मार्ग दुर्घटना में साहित्य के इस महाबली का अंत हो गया  लेकिन हम न मरब मरिहौं संसारा की तरह वे अजर अमर हैं।
            गांधी का करुण रस, कितने मोर्चे, चिडि़या रैन बसेरा, चितवन की छांह, फागुन दुई रे दिना, बसंत आ गया पर कोई उत्कण्ठा नहीं, रहिमन पानी राखिये, भ्रमरानन्द का पचड़ा, कृति सपने कहां गये, थोड़ी सी जगह दें और भारतीय संस्कृति के आधार जैसी कृतियां उनके और पाठकों के बीच एक रिश्ता बनाये है। उनके ललित निबंधों की महक साहित्य जगत में बनी हुई है। दैनिक जागरण के एक समारोह में अपने निधन से कुछ समय पहले ही उन्होंने कहा था- पत्रकारिता तनी हुई रस्सी पर नट की तरह चलने का काम है। वे लोगों को सतत सावधान करते थे। पत्रकारों को सहयोग और सहकार के साथ संवेदनशील बनने की प्रेरणा देते थे। बिना पढ़ाई-लिखाई कैसी पत्रकारिता? उनका सबसे कठिन सवाल था। कागज की सिला पर अपनी कलम को चंदन की तरह घिसने वाले संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान विद्या निवास मिश्र का ललित निबंध प्रभु जी तुम चंदन हम पानी उनके निर्मल व्यक्तित्व का उदाहरण है।



Tags:         

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

24 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jayne के द्वारा
May 21, 2011

Wow, your post makes mine look feelbe. More power to you!

अभयानंद कृष्‍ण के द्वारा
April 11, 2010

नि:संदेह पं. जी ने साहित्‍य के एक विशेष विधा को धनी किए, लेकिन उनकी रचनाओं में वह संवेदना कहीं नहीं दिखी जो साहित्‍य की आत्‍मा है। जीवन भी उनका ऐसा ही रहा जहां आडम्‍बर और पाखण्‍ड की झलक मिलती है। प्रेमचन्‍द्र और शरत बाबू की लेखनी ने जिस ढंग से इस संवेदना को उकेरा उसकी तब भी बहुत जरूरत थी, जब पं. जी संस्‍कृति के पाण्डित्‍य को महिमा मंडित कर रहे थे। व्‍यक्तिगत रूप से यह कमी मुझे बहुत अखरती है।

    Summer के द्वारा
    May 21, 2011

    Home run! Great slugging with that anewsr!

Suneel Pathak, jagran के द्वारा
February 28, 2010

राय साहब आपने मिश्र जी के बारे में काफी कुछ लिखा जिसकी जानकारी हम लोगों को नहीं थी। आशा करता हूं कि आपके अनुभवों से हम लोगों को निरंतर प्रेरणा और जानकारी मिलती रहेगी।

मिथले मिथिलेश द्विवेदी के द्वारा
February 15, 2010

प्रकांड विद्वान पं: मिश्र ने साहित्‍य के साथ ही पत्रकारिता को ठीक से जीया उनकी सीख याद रखने वाले पत्रकार वाकई कलम के धनी बन सकते हैं पंडित जी जैसे लोग दुनिया में कम होते हैं जो मरणोपरांत भी दुनिया में याद किए जाते हैं मिथिलेश द्विवेदी, गोरखपुर

    अम्‍बुज के द्वारा
    April 11, 2010

    मिथिलेश जी आप यह भी जानिए कि नव भारत टाइम्‍स के प्रधान सम्‍पादक की कुर्सी से उन्‍हें हटना पडा था। पत्रकारिता का एक धर्म है जिसमें पंक्ति के अंतिम व्‍यक्ति की पूजा की जाती है। अफसोस पं.जी ऐसा नहीं कर सके।

prem shanker mishra के द्वारा
February 14, 2010

दसवीं के सलेबस में पंडित जी का निबंध पढने को मिला था तब इतना ही पता था वह भी परीक्षा के लिहाज से से की वह ललित निबंधकार हैं। ललित निबंध कोई खास निबंध होता है आदि-आदि, लेकिन जब 6 नंबर के सवाल के लिए जीवन परिचय याद करता था तो खास गुदगुदी होती थी कि पंडित जी गोरखपुर के हैं यह जानकर। खैर डिग्री के साथ ही किताबों में बढी रू‍चि और तनिक और जानकारी से भान हुआ कि उनके शब्‍द किस तरह से चित्र खींचते हैं। आख्रिर यूं ही कोई ठेले पर हिमालय को नहीं उतार सकता। सचमुच आपके लेख के बहाने मिश्र जी बहुत याद आए। अच्‍छी पहल के लिए बधाई।

    SHRIKANT के द्वारा
    February 17, 2010

    भाई ठेले पर हिमालय किसने उतारा था, जरा ठीक से देखो।

कौशल के द्वारा
February 14, 2010

कलम तो हमेशा उनकी जय बोलती रही है. पंडित जी को शत शत नमन ..

    Celina के द्वारा
    May 21, 2011

    Your answer was just what I nedeed. It’s made my day!

Ajay के द्वारा
February 14, 2010

आपने विद्यानिवास जी को याद करते हुए जागरण के सात संस्कार भी गिना दिए हैं.

sumit rana के द्वारा
February 14, 2010

maine sil pahunchayee unka ek bahut hi mahtvapoorn nibandh hai. ismen chhot gaya hai.


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran